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(प्रो. शिवाजी सरकार) भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर अक्सर बड़ी तस्वीर दिखाई जाती है—तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, बड़े-बड़े निर्माण कार्य, नए एक्सप्रेसवे, हवाई अड्डे, पुल और शहरों का विस्तार। लेकिन अर्थव्यवस्था की असली ताकत केवल इन चीजों से तय नहीं होती। असली सवाल यह है कि क्या आम आदमी के हाथ में पैसा बढ़ रहा है? क्या उसे अच्छी नौकरी मिल रही है? क्या कारखानों में उत्पादन बढ़ रहा है? और क्या लोग बाजार में जाकर सामान खरीदने की क्षमता रखते हैं?
विकास हो रहा है, लेकिन नौकरी कहां है?
आज इन सवालों को गंभीरता से देखने की जरूरत है। भारत में मैन्युफैक्चरिंग यानि कारखानों में उत्पादन का हिस्सा लंबे समय से करीब 14-17 प्रतिशत के आसपास बना हुआ है, जबकि लंबे समय से इसे अर्थव्यवस्था का लगभग 25 प्रतिशत या उससे अधिक हिस्सा बनाने का लक्ष्य रखा जाता रहा है। इतनी बड़ी आबादी वाले देश के लिए यह केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं है। इसका सीधा संबंध नौकरी, मजदूरी, गांवों की आय, युवाओं के भविष्य और बाजार की मांग से है।
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(आशु सक्सेना): 20 जुलाई से शुरू हुआ संसद का मॉनसून सत्र 13 अगस्त को खत्म होना है, यानि आज सत्र का आखिरी दिन है। मॉनसून सत्र के पहले ही दिन सरकार को कॉकरोच जनता पार्टी के 'चलो संसद मार्च' जैसे जनांदोलन का सामना करना पड़ा। सरकार ने किसान आंदोलन और शाहीन बाग आंदोलन की तरह इस आंदोलन को भी कुचलने की कोशिश की, लेकिन जंतर मंतर पर डटी युवा शक्ति ने इस बार सरकार को घुटने पर ला दिया। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार के एक मंत्री को जनांदोलन के चलते अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इतना ही नहीं आज़ादी के बाद पहली बार कोई संसद सत्र ऐसा गुजरा है, जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने एक भी दिन लोकसभा और राज्यसभा में प्रवेश करने का साहस दिखाया हो।
पूरे मॉनसून सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक टकराव ने सदन की कार्यवाही को बुरी तरह प्रभावित किया है। एक तरफ लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी गृह मंत्री अमित शाह से 20 जुलाई को छात्रों के संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई पर सदन में जवाब मांग रहे हैं, तो दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि विपक्ष चर्चा चाहता ही नहीं, सिर्फ सदन को लगातार बाधित कर रहा है।
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(आशु सक्सेना): संसद के मॉनसून सत्र का पहला दिन हंगामें की भेंट चढ़ गया। संसद के दोनों सदनों यानि लोकसभा और राज्यसभा में हंगामें के चलते कोई कामकाज नहीं हुआ। सुबह 11 बजे शुरू हुए दोनों सदनों में जंतर मंतर पर चल रहे छात्रों के प्रदर्शन का मुद्दा छाया रहा। छह बार लोकसभा और सात बार राज्यसभा में स्थगन के बाद सदन की कार्यवाही को मंगलवार सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया गया है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए इस बात की संभावना कमी है कि मॉनसून सत्र के पहले सप्ताह संसद की कार्यवाही एजेंड़े के मुताबिक चल सकेगी।
विपक्ष छात्रों की समस्यों के साथ ही अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी मामले में भी प्रधानमंत्री मोदी पर सीधे निशाना साधे हुए है। विपक्ष की मांग है कि राम मंदिर में चोरी के मामले की पीएम मोदी ज़िम्मेदारी लें और निष्पक्ष जांच करवा कर दोषियों को दंड़ित करने का काम करें। राम मंदिर के अलावा विपक्ष देश की अर्थ व्यवस्था को लेकर भी मोदी सरकार के खिलाफ मुहिम छेड़े हुए है।
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(प्रो. शिवाजी सरकार): भारत में इथेनॉल को लेकर जिस तेजी से फैसले लिए जा रहे हैं, उसने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। शुरुआत पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से हुई थी, लेकिन अब सरकार विमानन क्षेत्र तक इसके इस्तेमाल की संभावनाएं तलाश रही है। सरकार का दावा है कि इससे कच्चे तेल का आयात घटेगा, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और प्रदूषण भी कम होगा। सुनने में यह योजना आकर्षक लगती है, लेकिन किसी भी बड़े बदलाव की सफलता केवल इरादों से नहीं, बल्कि उसकी तैयारी और वैज्ञानिक आधार से तय होती है।
सबसे पहले इथेनॉल की क्षमता को समझना जरूरी है। इथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में लगभग 30 से 33 प्रतिशत कम ऊर्जा होती है। इसका सीधा असर वाहन के माइलेज पर पड़ता है। यानी उतनी ही दूरी तय करने के लिए ज्यादा ईंधन की जरूरत होगी। अगर उपभोक्ता को कीमत भी लगभग पेट्रोल जितनी चुकानी पड़े और माइलेज भी कम मिले, तो उसके लिए इस बदलाव का फायदा कहां है? यह सवाल आज भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
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